जाट
सभी प्राप्त तथ्यों और विचारों पर पुर्नविचार करने पर पाया गया है कि जाट एक अत्यन्त प्राचीन शब्द है और एक उपाधि है जिसका अर्थ है शासक/राजा। जाट बलशाली , वीर्यवान, प्रचंड पराक्रमी व कर्मशील हैं। सम्पूर्ण क्षत्रियों में जाट जाति ही सर्वप्रथम शासक हुई। जाटों ने तिब्बत, युनान, अरब, ईरान, चीन, तुर्कीस्तान, ब्रिट्रेन, जर्मनी-साइब्रेरिया-रोम व मिश्र आदि में कुशलता, दृढ़ता और साहस के साथ राज किया। स्वामी दयानन्द भी जाट शब्द का अर्थ शासक के रूप में करते हैं। )ग्वेद में कोई 40 से अधिक जाटवंशों के नाम हैं और इनमें से बहुतों को खुलकर जाट कहा गया है।

आर्यमंजु श्री मूलकल्प में हर्षवर्धन और सम्राट चन्द्रगुप्त के जाट होने के प्रमाण मिलते हैं। बहुत से जाट वंश आरम्भ से ही हरियाणा -पंजाब-वर्तमान पाकिस्तान-अफगानिस्तान और मध्य एशिया में थे। जाट लैंड की संरचना एक पंखे के आकार जैसी है जिसका आधार सिंध में है। जाट लैंड का सीमांकन उत्तर में हिमालय के नीचे से पर्वत श्रृंखला से होता है और पश्चिम में सिन्धु नदी से। दक्षिण में हेदराबाद से शुरू होकर अजमेर और फिर भोपाल तक फैला हुआ है तथा पूर्व में गंगा नदी उसकी सीमाओं को प्रदर्शित करती है। जाट इतिहास लेखक कालिका रंजन कानुनगो के अनुसार सन् 1925 में जाटों की जनसंख्या देश में 90 लाख थी जो इस समय करोड़ों में है। जाटों में अब एक तिहाई मुसलमान व सिक्ख और शेष हिन्दू हैं। जाट चाहे हिन्दू हो या सिक्ख और या मुसलमान वह आखिर में जाट है और एक समान बहादुर व बलशाली हैं। मुहम्मद गौरी व शेरशाह सूरी और मुगल ये तीनों भी जाटों के गौर-शूर व मुगल वंशों से थे लेकिन धर्म परिवर्तन के कारण जाटों से अलग रहे।

अधिकांश इतिहासकारों ने स्वीकार किया है कि जाट भारतीय आर्यों की संतान हैं। जाटों की शारीरिक संरचना-भाषा तथा बोली उन्हें आर्य प्रमाणित करती है। डा? ट्रम्प -बिम्स व डा? देशराज ने अपने शक्तिशाली शब्दों में जाटों को शु( आर्य घोषित किया है। प्रोफैसर कानुनगो भी जाटों को आर्यों के वंशधर मानते हैं। लेकिन शास्त्रार्थ महारथी प? माधवाचार्य शास्त्री व अन्य कुछ लेखकों का मानना है कि भगवान श्ंाकर की जटा से उत्पन्न होने के कारण ही इस समुदाय का नाम जाट पड़ा है। उनका तर्क है कि भगवान शिव के गुणों की सादृश्यता जाटों में आज भी विद्यमान है और जाट देवताओं के समान दृढ़ संकल्प वाले हैं।

भारत में जाट मुख्यतः तीन महावंशों के बताए गए हैं। कश्यप, शिव और यदु। इस सम्बन्ध में जाट इतिहास में काफी प्रमाण दिए गए हैं। यहां संक्षेप में कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं।

भारतीय जातिशास्त्र के प्रसिद्ध अन्वेषक मि? नेस्फील्ड साहब लिखते हैं -जाट यदु थे। यह वही जाती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण पैदा हुए थे।

ट्राईब्ज एण्ड कास्टस आॅफ दी नार्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज एण्ड अवध में मिस्टर डब्ल्यु कुर्क साहब लिखते हैं कि दक्षिण पूर्वी प्रांतों के जाट अपने को दो भागों में विभक्त करते हैं। शिव के वंशज और कश्यप गोत्री।

ऊपर के उदाहरण में तीन बातें सामने आती हैं। (1) जाट यदुवंशी हैं (2) जाट शिवगोत्री हैं (3) जाट कश्यप गोत्री हैं। और यही सच्चाई भी है। यह भी स्पष्ट है कि वैदिककाल -रामायण काल-महाभारत काल-बौ(काल और मध्यकाल के अनेक राजवंशों का जाटों में समावेश है।

दूसरों के लिए लड़ना, खपना, दूसरों की रक्षा के लिए सरहदों पर सिर कटवाना व दूसरों की आग में अपनों को स्वाहा करना जाट का स्वभाव है। धोखा देना-बेईमानी करना-चापलूसी करना-झूठ बोलना, ठगी और मक्कारी करना इन्हें आता ही नहीं। सिकन्दर के आक्रमण के समय मल्ली जाट अपने खेतों में काम कर रहे थे। ग्रीक सेना को देखकर घरों से हथियार उठाए और यु( भूमि में आ डटे। वह कोई और नहीं बल्कि मल्ली जाट ही था जिसने अपने भाले से वह घाव दिया जो सिकन्दर के लिए जानलेवा साबित हुआ। अतः जाट सदा से ही बहादुर रहे हैं।

जो कौम सभी देशवासियों का पेट भरती रही और उनकी सुरक्षा भी करती रही, आज वह अपने अस्तित्व के लिए भी चिंतित है। यह घोर विडम्बना है कि हरित क्रांति की सारी कमाई दलाल व बिचैलिये खा गए और आज किसान के हाथ केलव कर्जा और आत्महत्या आए। दीनबन्धु सर छोटूराम कहा करते थे कि अपने व पराए की पहचान करना सीखो और हक के लिए बोलना सीखो। देखो कि कौन कौम की भलाई करता है ओर कौन कौम को बेचता है। जो कौम का नहीं, वह काम का नहीं। जो जात का नही-वह बात का नहीं। जो कास्ट का नहीं-वह राष्ट्र का नहीं।

जिन बिरादरियों ने, जिन जातियों ने, जिन कौमों ने अपनी सामाजिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं, सभ्यताओं व मौलिकताओं की तिलांजलि दे दी और असभ्य विपरीत शक्तियों से समझौता कर लिया, उनके अस्तित्व को मिटते देर नहीं लगी चाहे वह सभ्यता युनान की हो, मिश्र की हो या किसी और की हो, परन्तु जाट कौम की हस्ती मिटाए से भी नहीं मिटी। इसलिए डा? इकबाल कहते हैं:-

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा।
युनान, मिश्र व रोम सब मिट गए जहां से,
अब तक मगर बाकि नामो निशां हमारा।


हमें खतरा गैरों से नहीं, अपनो से ही है। जाट के बारे में यह प्रमाणित सत्य है कि जाट को जाट ही मार सकता है। आज आपसी मनमुटावों को भुलाकर एक होने की जरूरत है। जो बंट गया-वो घट गया। अब कुछ कर गुजरने का वक्त सिर पर आ चुका है। हम अपनी नस्लों के लिए अपना हक हासिल करें, नहीं तो आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी कि हमने उनके लिए क्या किया।

चर्ख (आसमान) का क्यों गिला करें,
दहर (जमाने) से क्यों खफा रहें।
सारा जहां अदू (दुश्मन) सही,
आओ मिलकर मुकाबला करें।


जाट का रखवाला राम है। सांच को आंच नहीं। जाट अपनी मर्यादाओ,असूलों, ईमानदारी और मेहनत पर कायम रहे तो कोई भी उसका बाल बांका नहीं कर सकता, क्योंकि -

फानुस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे,
उस शमां को कौन बुझा सके जिसे रोशन खुदा करे।
 
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